यदि किसी व्यक्ति ने यह नजर मानी की उदाहरण के तौर पर अगर मैं अमीर हो जाऊं तो अल्लाह के वास्ते मस्जिद बनाऊंगा फिर वह अमीर हो जाए तो मस्जिद बनाना वाजिब नहीं क्योंकि नजर के सही होने की एक शर्त यह भी है कि जिस चीज की नजर मानी जाए वह इबादते मकसूदा में से हो अगर चे मस्जिद बनाना वाजिब तो है मगर चूंके इबादते मकसूदा में से नहीं है इसलिए अमीर हो जाने पर मस्जिद बनवाना नजर की हैसियत से वाजिब ना होगा लेकिन अल्लाह पाक हैसियत दे और अमीर बना दे और जरूरत की जगह में मस्जिद बनवा दे तो उसका बहुत बड़ा सवाब होगा।
(वल्लाहु आलम)
(मुस्तफाद: फतावा दारुल उलूम देवबंद
फतावा शामी पार्ट नंबर3 पेज नंबर47
नाकिल✍हिदायतुल्लाह
खादिम मदरसा रशीदिया ड़ंगरा गया बिहार
HIDAYATULLAH
TEACHER.MADARSA RASHIDIA.DANGRA.GAYA.BIHAR.INDIA
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